My Past, Present and Future…..

Saturday, 26 January 2013

सिकुड़ता गणतंत्र


  आज जब इस 26 जनवरी को राजपथ पर देश के राष्ट्रपति तीनो सेनाओं की सलामी ले रहे होंगे तब यह देश इस 63 साल पुराने गणतंत्र को एक बार फिर से सँभालने की कोशिश कर रहा होगा। जब देश  के महामहिम एक विदेशी अतिथि के सामने अपने देश के वैभव-सम्पन्नता का दिखावा कर रहे होंगे तब विदर्भ का एक किसान आत्म-हत्या करने के लिए अपने गले में रस्सी डाल रहा होगा। जब हमारे देश की अक्षौहिणी सेना अपने ताकत का प्रदर्शन कर सीमा के पार बैठे अपने दुश्मनों के मन में डर पैदा करने की कोशिश कर रही होगी तब इसी माँ भारती का एक गद्दार बेटा अपने ही भाइयों के लिए आग उगल रहा होगा। जब सारा राष्ट्र ख़ुशी के माहौल में एक साथ झूम रहा होगा तब इस देश को बांटने वाले भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर एक ही माँ के बेटो के मन में नफरत घोल रहे होंगे। जब देश के गणमान्य नेता हजारो पुलिसों के सुरक्षा घेरे में होंगे तब हमारी ही कोई बहन इसी धरती पर किसी मानव-शरीर धारी राक्षस के कुत्सित इरादों का शिकार होकर अपने इज्जत की रक्षा के लिए आवाज दे रही होगी। पर इस जश्न के माहौल में देश के सत्ताधीशो को न तो उस किसान का दर्द समझ में आएगा, ना ही उस गद्दार की परवाह होगी और ना ही इस लड़की की चीख सुनाई देगी।
  हजारो साल पहले एक यूनानी के इस हिंदुस्तान पर आक्रमण करने पर 'उत्थिष्ट भारत' का नारा लगाने वाले चणीक-पुत्र चाणक्य ने जिस अखंड भारत का सपना देखा था उस सपने को इसी देश के जयचंदों ने हमेशा मटियामेट किया। भारत के जिन सीमाओं ने विश्व-विजेता सिकंदर की अपराजेय सेना को वापस लौटने के लिए मजबूर किया वहीँ भारत की सीमाएं कई बार विदेशी आक्रान्ताओं के द्वारा लांघी गई। गजनी के महमूद, मंगोलियन तैमुर और ईरानी लुटेरे नादिरशाह से लेकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तक, सबने इस देश को अपनी अकांक्षाओं का शिकार बनाया। सैकड़ो सालो तक विदेशी ताकतों की पराधीनता में यह देश अन्दर ही अन्दर इतना खोखला हो गया था की इसके पास इन विदेशियों के खिलाफ आवाज उठाने तक की शक्ति नहीं बची थी। जब इस धरती के युवाओं के कंधे विदेशी दासता के सामने झुकने लगे थे तब माँ भारती ने गाँधी, भगत, आजाद, बोस और पटेल जैसे बेटो को जन्म दिया। झुके हुए सर उठ गए, बुढ़ापे की हड्डियों में जवानी का दम आ गया और देश को हमने उन विदेशियों से वापस छीन लिया। भारतीय गणराज्य दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना और देश को अपना सविधान मिला। जब लालकिले की प्राचीर पर तिरंगा लहराया तो देशवासियों ने आजाद हिंदुस्तान का एक ऐसा ख्वाब बूना जो अपने गौरवशाली अतीत की पुनरावृत्ति कर सके। आंबेडकर और राजेंद्र प्रसाद के लिखे कानून को देश का सविंधान मान कर देश की सत्ता नेहरु के हाथो में सौप दी गयी। और तब इस देश का एक ऐसा सफ़र शुरू हुआ जिसने आज 63 साल बाद हमें इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ हमें एक ओर तो भविष्य के बड़े बड़े सपने दिखाए जा रहे हैं तो वहीँ दूसरी और यथार्थ का गन्दा रूप।
  आज जहाँ 'मिशन 2020' का सपना बूना जा रहा हैं वहीँ सच्चाई के धरातल पड़ यह देश कई खंडो में विभाजित नजर आ रहा है। जहाँ देश की सेना नित नए हथियारों से लैश होकर विदेशी ताकतों का सामना करने के लिए तैयार हो रही हैं वहीँ देश के अन्दर देश की बेटिया खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रही हैं। बचपन में इस देश के जिस 'अनेकता में एकता' के बारे में पढ़ा था वह शब्द अब एक सपना लग रहा है। श्रीनगर से कन्याकुमारी तक और अरुणाचल से कच्छ तक, यह भारत अब एक भारत नहीं रह गया है। इस देश में अब खोजने से हिन्दू मिल जायेंगे, मुस्लिम और इसाई भी मिल जायेंगे; बिहारी, पंजाबी, मराठी, गुजराती और तमिल भी मिल जायेंगे; खोजो तो हिन्दीभाषी, बंगला, कन्नड़ और तेलुगुभाषी भी मिल जायेंगे पर चाहे कितना भी कोशिश कर लो, शायद ही कोई भारतीय तुम्हे मिले। धर्म, जाती, भाषा और क्षेत्र के नाम पर लड़ने वालो ने इस देश को अब एक नहीं रहने दिया है। जिसका नतीजा आये दिन होने वालो दंगो में निर्दोषों का खून बहाकार चुकाना पड़ता है। आसाम और गुजरात के दंगो में मरने वाले लोग हिन्दू या मुस्लिम होने से पहले इस भारत माँ के बेटे थे, मराठी और बिहारी के नाम पर झगड़ने वाले भी इसी माँ भारती के कोख से जन्म लिए है। पर खंड-खंड में विभाजित इस देश के वाशिंदे यह नहीं समझ पा रहे हैं की इनके आपसी झगड़ो से इनका ही नुकसान हो रहा है। जनता की इस कमजोरी का फायदा देश की राजनितिक पार्टिया और उसके नेता उठा रहे हैं। अपने नीच राजनितिक महत्वकांक्षाओं  की पूर्ति के लिए इस देश के नेता देश की जनता को मुर्ख बनाकर अपनी राजनीती की रोटियां सेक रहे हैं। अपना वोट बैंक बढाने के लिए ये नेता भारत माँ को और उसके बेटो को जाती, धर्म, क्षेत्र और भाषा के नाम पर बाँट कर उनपर राज करते हैं। जातिगत आरक्षण, धार्मिक दंगे, क्षेत्रवाद इनके कुछ ऐसे उदहारण हैं जिनका इस्तेमाल ये सत्ता पाने के लिए सालो  से करते आ रहे हैं। और मुझे ताज्जुब तो तब होता है जब इस देश की "पढ़ी लिखी अनपढ़ जनता" इनके झांसे में आ जाती है।
  मैं अक्सर सोचता हूँ की आज हम कोरिया, सिंगापुर, ताइवान और जापान की तरह विकसित क्यों नहीं हैं क्योकि 60 साल पहले शुरुआत तो हमने भी वहीँ से की थी जहाँ से इन देशो ने। पर शायद इसका जवाब बहुत कड़वा है। इस गणतंत्र का तंत्र में इतने भ्रष्टाचारी बैठे हैं की इस देश को बचाने वाला चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता है। कानून बनाने वाले से लेकर कानून के रखवाले तक, सब इन कानूने के साथ अपनी इच्छानुसार खेलते हैं।और इन सब का नुकसान इस देश की कमजोर और बेबस जनता को भुगतना पड़ता है।
  क्या यहीं है चाणक्य का अखंड भारत, क्या यहीं है गाँधी के सपनो का रामराज्य, क्या इसी शासन तंत्र के लिए पटेल ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ा था। अगर यहीं है भारत की असलियत तो फिर इकबाल की वह लाइन गलत नहीं है।
"वतन की फिकर कर नादाँ, मुसीबत आने वाली है,
तेरी बरबादियो के मशवरे हैं आसमानों में,
न समझोगे तो मिट जाओगे, ऐ मेरे वतन के लोगो,
तुम्हारी दास्ताँ तक भी ना होगी दस्तानो में।"

Saturday, 3 November 2012

रिश्तो की आधुनिकता

रूप की धुप गर्म होती हैं,
कली है कली, नर्म होती हैं,
धीरे धीरे चलना कहारों, 
डोली का पर्दा न हिले,
क्योकि नयी दुल्हन में शर्म होती हैं।

   बात तब की है जब में आठवी कक्षा का छात्र था। तब में अपने गाँव में रहता था और गाँव में एक समाचार पत्र बड़ा मशहूर था, 'हिंदुस्तान'। इसी समाचार पत्र के संपादकीय पृष्ठ पर मैंने एक दिन यह लाइन पढ़ी... पढ़कर मुझे भारतीय संस्कृति का वो पारंपरिक जमाना याद आ गया जब दुल्हने डोली में बैठा कर पिया के घर विदा की जाती थी। तब से अब तक काफी समय बीत गया और अब मै शहर के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज का छात्र हूँ पर आज भी यह लाइन मुझे वैसे ही हु-ब-हु याद हैं।
अब जब भी अपने चारो तरफ देखता हूँ, सिर्फ आधुनिकता ही दिखती है। और इस आधुनिकता में आधुनिकता कम और दिखावापन ज्यादा हैं। आज न तो कोई दुल्हन डोली में विदा होती है और न ही कोई दूल्हा घोड़ी चढ़कर आता हैं। घोड़ी और डोली का स्थान बड़ी-बड़ी कारो ने ले लिया हैं। विदा होते समय न दुल्हन के आँख से आंसू गिरते हैं और और ना बाबुल का घर छुटने का गम होता हैं। अब  दुल्हने विदाई के समय यह गाना गाती हैं...
चल री सजनी अब क्या सोचे,
कजरा ना बह जाए रोते रोते,
   उनको विदाई के समय भी अपने कजरे और सुन्दरता का ध्यान रहता हैं, क्योकि इस आधुनिकता में सुन्दरता के दीखावेपन का बहुत बड़ा स्थान हैं। हाँ, गांवो में अब भी थोड़े रीती-रिवाज बचे हुए हैं तो शहरों में आधुनिक पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने इन सब को दकियानूस बताकर इनसे किनारा कर लिया है। शहरी पढ़े लिखे ट्रेंड लोगो के पास वक़्त नहीं होता है इन सब रीती रिवाजो के लिए। इन शहरी लोगो के लिए शादी सात जन्मो का बंधन नहीं, एक बिजीनेस डील हो गया हैं, जिसमे मंत्रो के बारे में कम और 'टर्म्स एंड कंडीशन' के बारे में ज्यादा सोचा जाता हैं। और ऐसी शादियाँ अब बिजीनेस के सामान ही हो गयी हैं। ये शादिय तब तक ही चलती हैं जब तक की ये सारे 'टर्म्स एंड कंडीशन' पूरे किये जाते हैं। ये शादियाँ कच्चे धागे से भी ज्यादा कमजोर होती हैं जो कभी भी टूट सकती हैं। पति-पत्नी का  छोटी-छोटी बातो पर झगड़ना आम बात हो गया है। और हद तो तब हो जाती हैं, जब इन झगड़ो को आये दिन पति पत्नी कोर्ट में लेकर जाते हैं। जिसके साथ सारी जिंदगी साथ रहने की कसमे खानी थी उनपर कोर्ट में एक से बढ़कर एक झूठे आरोप लगाये जाते हैं। आपसी झगडे, जिनका समाधान उन्हें खुद घर में बैठकर कर लेना चाहिए, उसके लिए कोर्ट के जज और वकील की जरुरत पड़ती हैं। और तब ये शहरी पढ़े लिखे खुद को मॉडर्न बोलते हैं। लानत हैं ऐसी मॉडर्नाइजेशन पर। उस मॉडर्नाइजेशन का मतलब ही क्या जिसमे इंसान रिश्तो का मतलब ही न समझे। जहाँ रिश्तो में प्यार कम और लाभ-हानि ज्यादा हो। जहाँ घर की बाते बाहर वाले सुलझाये।
   इनसे तो अच्छे हम गांववाले हैं। हम गवांर सही पर रिश्तो का मतलब तो जानते हैं। हम शायद पढाई की बड़ी-बड़ी बाते न समझ पाए, प्यार की भाषा तो समझते हैं। हम आधुनिकता के मद में पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करने के बजाय अपने विशाल भारतीय संस्कृति का हिस्सा होना पसंद करते हैं।
   मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं, पर पश्चिमी सभ्यता का विरोधी हूँ। मै उन लोगो का विरोधी हूँ जो आधुनिक होने के चक्कर में आंख मूंद कर पश्चिमी सभ्यता और नग्नता का अनुसरण कर रहे हैं।  आज भी हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति का दुनिया के विद्वान लोहा मानते हैं, पर हम अपने  ही घर में इन कथित मॉडर्न लोगो से हार जाते हैं। इन मॉडर्न लोगो से मै बस इतना ही अनुरोध करूँगा की एक बार जरा सोचना "कहीं मॉडर्न होने के चक्कर में तुम कई कीमती रिश्ते तो नहीं खो रहे हो।"

Tuesday, 2 October 2012

एक सपना मेरा भी


   सपने देखने का अधिकार तो सबको होता है। सपने देखने का जितना अधिकार आपको है उतना ही मुझे। और मैंने अपने इस अधिकार का पूरा इस्तेमाल किया है। इन खुली आँखों से अकेले में मैंने भी कुछ सपने देखे हैं। आने वाले कल के लिए कुछ सपने है मेरे मन में तो बीते हुए कल की कुछ यादे और इनसे सिखा हुआ कुछ अनुभव। इन्ही यादों और अनुभवों के साथ आने वाले कल से कुछ आशाएं लगा रखी है मैंने। मै जानता हूँ की हमें आने वाले कल से कुछ आशा नहीं करनी चाहिए पर मानव-मन बहुत कमजोर होता है जो सत्य और असत्य की परिभाषा जानते हुए भी उनमे अंतर नहीं कर पाता है। मैने भी जाने अनजाने कई आशाएं मन में संजो ली हैं। हाँ, मैंने इनके पूरे होने की शर्त नहीं रखी है, क्योकि सपने देखने का अधिकार हमें है, पर उसके पूरे होने का निर्णय करना तो भगवान् के हाथों में है।
बायोटेक्नोलोजी लैब में
   मैं बिहार के सिवान जिले का रहने वाला हूँ। इस जिले के एक गाँव गोरेयाकोठी में मेरा जन्म हुआ था, सालो पहले, तब की बाते मुझे याद नहीं, क्योकि तब मै बहुत छोटा था। हाँ, माँ अक्सर बताती है की बचपन में मैं जरुरत से ज्यादा शैतान था। किसी भी उपयोगी सामान से मेरी दुश्मनी होती थी। मै अक्सर इनको या तो तोड़ देता या फिर कहीं फेंक देता जिससे ये किसी को न मिले। मुझे ना जाने क्यों, शुरू से ही ऐसे कामो में बड़ा आनंद मिलता था। मेरे ये कारनामे पूरे मोहल्ले में प्रसिद्ध थे। मोहल्ले का कोई भी सामान अगर गायब होता तो सबसे पहला शक मेरे ऊपर आता था। और लोग बिना सोचे समझे आनन्-फानन में मुझे अपराधी घोषित कर देते। पर इसका नाजायज फायदा दुसरे लड़के उठाते थे। घर का कोई सामान मेरे भाई या बहन ने तोडा पर शक की सुई सबसे पहले मेरे ऊपर आती थी और बिना मेरे से पूछे मुझे तोड़ने का इनाम भी मिल जाता था (मुझे ये बताने की जरुरत नहीं की इनाम में क्या मिलता था)। तब ऐसे इनाम पाने का मजा भी कुछ और था। क्योकि तब मेरी छोटी सी दुनिया में इन सब चीजो का महत्व कुछ ज्यादा ही था। समय बिता और इसके साथ मेरा बचपन भी बीत गया। मै बड़ा होता गया और मेरी शैतानिया कम होती गयी। किशोरावस्था में कदम रखने के साथ ही मैंने पढाई पर ध्यान देना शुरू कर दिया। मैंने गाँव में ही रहकर दसवी तक की पढाई की। तब न तो मेरे आँखों में बड़े सपने पलते थे और न ही बड़े सपनो का मतलब समझता था। पढाई के साथ घर का काम करना, गाये खिलाना, और बाजार से सामान लाना, और थोडा समय निकालकर खेलने भाग जाना बस यहीं मेरी दिनचर्या हुआ करती थी। दसवी तक किरोसिन तेल के लैम्प में पढाई करके अच्छे मार्क्स लाने के बाद आगे की पढाई करने मै पटना चला आया। पहली बार किसी शहर में आया था। गाँव के छोटे-छोटे घरो में रहने का बाद शहर की इन बहुमंजिली इमारतो को देख कर चकित था मैं। छोटे गाँव के छोटे सपनो से निकलकर एक बड़े शहर में आने के बाद मुझे भी बड़े सपने देखने का हक़ मिल गया (मेरा अभी भी ये भ्रम है की सिर्फ बड़े शहर के लोग ही बड़े सपने देख सकते हैं )। पटना के पटना सेंट्रल स्कूल से मैंने बारहवी की पढाई की। बाईपास के किनारे बड़े से लाल रंग के स्कूल को देखकर मैंने यह समझ लिया था की स्कूल भी बहुत अच्छा है। हालाँकि मेरा यह भ्रम कुछ दिनो के अन्दर ख़त्म हो गया। इस लाल रंग की विशाल इमारत से मेरा मन एक साल के अन्दर ही इतना ऊब गया की मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया। शुरू से ही आजादी मेरे रग़-रग़ में भरी हुई थी, जहाँ थोड़ी सी आजादी मिली, वहीँ मेरी मस्तिया शुरू हो जाती थी। 2008 का पूरा साल मैंने अपनी मस्तियो में बिता दिया। पर मेरी आँख तब खुली जब 2009 की शुरुआत हुई। तिन महीने के अन्दर मेरा बोर्ड एक्जाम होने वाला था और मेरी तैयारी जीरो थी। जैसे-तैसे हड़बड़ी में जो कुछ कर सकता था, इन तिन महीनो के अन्दर किया और बोर्ड का एक्जाम दे दिया। बोर्ड एक्जाम के रिजल्ट अपेक्षा से ज्यादा अच्छे निकले। बारहवी की परीक्षा पास करने के बाद मैंने आई.आई.टी का एक्जाम दिया और उसमे सफलता प्राप्त करने के बाद मैंने आई.आई.टी मद्रास में एडमिशन ले लिया। अभी मै आई.आई.टी मद्रास में बायोटेक्नोलोजी डिपार्टमेंट का थर्ड ईयर का छात्र हूँ।
   आज मै देश के एक बड़े शहर में रहता हूँ एक बड़े कॉलेज में पढता हूँ, और बड़े सपने देखता हूँ। हाँ, मेरे बड़े सपने शहर के रहने वाले उन बाकी बच्चो के बड़े सपनो से अलग हैं। इन बच्चो के बड़े सपनो  में एक अच्छी सी नौकरी, एक बड़ा घर और सोसाइटी में एक बड़ा इज्जत होता है (बड़ी इज्जत का मतलब मै भी नहीं समझता)। पर मैं एक गाँव की मिटटी से आया हूँ। मैंने धुल में पड़े उन बच्चो की आँखों में पल रहे अधूरे सपने को देखा है जो कभी पूरे नहीं हो पाते। मैंने अमीरों की मार सहने वाले गरीबो के दर्द को देखा है, जो इन अमीरों के पैरों तले रौदे जाते हैं। मैंने उस कमजोर वृद्ध किसान को देखा है जिसके पास खड़े होने की शक्ति भी नहीं है पर फिर भी काम कर रहा है क्योकि उसे डर है की कहीं कल की तरह आज भी चूल्हा ठंडा न रह जाये। मैंने बीमारी से मरते हुए लोगो को देखा है जिसके पास डॉक्टर और दवा के पैसे नहीं थे।
   मेरा सपना न तो इस गरीब किसान को खाना देने का है ना ही इस बीमार को दवा के पैसे देने का है। और ना ही मै गरीबो को अमीरों के अत्याचार से बचाने जा रहा हूँ। मेरा तो बस एक छोटा सा सपना है, उस धुल में पड़े हुए बच्चे की आँखों में पल रहे अधूरे सपने को पूरा करना। मै उसके सपनो को हकीकत में बदलना चाहता हु, क्योकि मै जानता हूँ की अगर उसका सपना पूरा हो जायेगा, अगर उसने जिंदगी में पढाई कर ली, तो शायद वो दस और बच्चो के सपनो को पूरा करने की कोशिश करेगा और फिर वो दस सौ की..... । फिर मेरे गाँव में कोई गरीब न रहेगा। तब ये अमीर किसी पर अपना ज़ुल्म नहीं कर पाएंगे। तब कोई कमजोर किसान भूख के लिए नहीं तडपेगा और ना कोई रोगी दवा के पैसे न होने के कारण मरेगा।

   आज इन्ही सपनो को अपने आँखों में संजोये आने वाले कल का इन्तजार कर रहा हूँ............ ।

Friday, 28 September 2012

शायद हमारी किस्मत में यहीं है....

हम वो पत्ता नहीं जो आंधी के आने का इंतज़ार करे
हम तो वो हैं की ख़ामोशी टूटी और वहां जा गिरे
जहाँ ना गाँव, ना घर, ना खेत, ना खलिहान
वहां सिर्फ शैतान ही शैतान....
चोट लगी, दर्द हुआ और आवाज आई
"तेरी किस्मत में यहीं हैं...."

हम वो फूल नहीं जो कोई दुसरो को दे खुश कर सके
हम तो वो हैं जिसपर भौरे भी बैठने से नकारते हैं
सुगंधहीन, कुरूप और लाचार,
जो आख़िरकार गिर जाते हैं
दर्द तो होता है और आवाज आती है
"तेरी किस्मत में यहीं हैं...."

हम वो नहीं जो महलों में रहे, बगीचों में टहले
हम तो वो हैं जिसे दुनिया ना तो प्यार देती है,
और ना इज्जत देती है,
वो करती भी है तो सिर्फ दिखावा
चोट दिल पे लगती है और दर्द बहुत होता है,
और फिर आवाज आती हैं
"तेरी किस्मत में यहीं है...."

ये दुनिया न तो बढ़ते देख सकती है किसीको ना हम जैसो को उठते
परिवार का साथ नहीं, किसी का याद नहीं
हम तो वो हैं जिसे दुनिया पैर की गंदगी और फलो की गुठलियाँ समझती हैं
जिसे खाने के बाद फेंक दिया
दर्द बहुत होता है और फिर आवाज आती है
"तेरी किस्मत में यहीं है...."

क्यों ऐसी जिंदगी मिली जहाँ रुलाया जाता है
हर वक़्त हर क्षण एक लाचार और बेबस होने का एहसास दिलाया जाता है
वक़्त पड़ते सभी ऐसे नजरे फेर लेते हैं
जैसे हमने अपनी बदकिस्मती, खुद ही लिखी है
चोट दिल पर लगती है और फिर आवाज आती है
"तेरी किस्मत में यहीं है...."


सोचा हैं रब को भी देनी है हमें एक अर्जी
क्यों नहीं होती है पूरी हमारी कोई मर्जी,
हार चुकी हु मै अपनी जिंदगी, ऐसी किस्मत से
वहीँ हो जाता है दूर जिसे जोड़ना चाहती हूँ अपने जीवन से
कोई उम्मीद नहीं रखना अब इस दुनिया से
कई चुनौतियों और ठोकरों से रु-ब-रु होते होते
शायद अब मैंने ये समझ लिया है
चोट दिल पर लगती है, दर्द बहुत होता है
और फिर समझ आती है
"शायद हमारी किस्मत में यहीं है...."