My Past, Present and Future…..

Saturday, 24 March 2012

याद आते हैं वो दिन


   आज शाम कुछ ज्यादा ही उदास लग रही थीकमरे में बैठे हुए मेरा मन कुछ उचट सा रहा थादिल में अन्दर ही अन्दर कुछ अजीब घबराहट सी हो रही थीअन्दर के इस घबराहट को कमरे का सूनापन और बढ़ा रहा थाअपने मन को शांत करने के लिए मै कमरे से बाहर आकर बालकनी में कुर्सी पर बैठ गयासामने कुछ बन्दर कूड़े से कुछ खाने लायक चीजे ढूंढ़ कर निकालने की कोशिश कर रहे थेउसके बगल में - बन्दर के बच्चे आपस में खेल रहे थेउनके खेल ने मेरा ध्यान उनकी ओर खिंचाएक बच्चा, जो उनमे सबसे छोटा था, वो पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा थातो दुसरे ने उसकी पूंछ पकड़ कर खिंच दीतीसरे को एक प्लास्टिक का डब्बा मिल गया और वो खुश होकर भागा, इसपर पहले और दुसरे ने एक साथ उसपर आक्रमण कर दियावानर दल के इस बाल-क्रीड़ा को देखते-देखते कब मै अपने बचपन में खो गया, इसका मुझे पता भी नहीं चला
   बचपन के वो दिन कितने अच्छे थे, इसका अंदाजा अब मुझे हो रहा थाआज जब मै उन दिनों को खो चूका था तब मुझे उनकी कमी खल रही थीमै एक गाँव में पला-बढ़ा थामैंने प्रकृति की गोद में अपना बचपन बिताया थामैंने धुल में लोट कर चलना सिखा थाजहाँ मेरे पसंदीदा खेल गुल्ली-डंडा और कबड्डी हुआ करते थेजब दोपहर में गर्मी के समय माँ के लाख डाटने के बावजूद हम सारे भाई-बहन छुप कर घर से भाग कर बगीचे में चले जाते थेबगीचे में आम और कटहल के बहुत पेड़ थे और उस समय आम के टिकोले हमारे जिह्वा के स्वाद ग्रंथियों को इतने भा गए थे की उसके लिए हम एक दिन पहले की अपनी पिटाई को भी भूल जाते थे और उस दिन फिर मार खाने के लिए अपने शरीर को तैयार रखते थेघर से भागने से पहले हमारे में से कोई एक चाकू साथ में लाता थाबगीचे में पहुँचने के बाद हमारी टोली की सभा एक पेड़ के नीचे बैठतीफिर रोहन, जो हम सबमें सबसे लम्बा था वो केले के पते काट कर लाता थाफिर एक पेड़ से टिकोले तोड़ कर हम इनकी भुंजिया बनातेउसमे नींबू, नमक और मिर्च डालकर हम इनकी सलाद बनाते थेमूझे आज भी याद है, इस टिकोले की सलाद में जो स्वाद था, आज तक वो स्वाद मुझे कहीं और मिलाशायद इस स्वाद में हमारी आज़ादी, हमारा झगडा और प्यार छुपा होता था जो बचपन के दिनों के साथ ही चला गयाइस सलाद से अपनी क्षुदा तृप्ति करने के बाद हमारी बाल-सेना इस बगीचे को अपना गुल्ली-डंडा ग्राउंड बना लेतीहमारा ये खेल शाम तक चलता रहता जब तक हमारे पेट की अंतड़िया हमें वापस घर लौटने को मजबूर कर देतीघर लौटने पर हमारे स्वागत के लिए माँ दरवाजे पर उस मोटे डंडे के साथ खड़ी रहती जिसे माँ दुखहरण और हम अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझतेफिर डंडे से हमें माँ के इच्छानुसार इनाम मिलता और तब खानालेकिन एक बात माननी पड़ेगी माँ की, उन्होंने कभी हम भाई-बहनों के साथ भेदभाव नहीं किया, सबको दुखहरण से बराबर का इनाम मिलता, किसी को कम ना ज्यादा (आखिर माँ थी हमारी भेदभाव कैसे करती )। वैसे उस दुखहरण की कहानी भी बड़ी अजीब थीउसके उत्थान और फिर उसके पतन की कहानी अगर मै विस्तार से बता तो वो भी अपने आप में इतिहास का एक पाठ बन जायेगापर यहाँ आपके जानकारी के लिए संक्षिप्त में ही बता रहा हूँतब मेरे घर में दरवाजे और कुर्सियां बनाने का काम लगा थाउसी दौरान एक मिस्त्री ने पापा के कहने पर उसका निर्माण कर दियावो लकड़ी का एक फालतू लम्बा टुकड़ा था जिस पर रंदा चला कर उसे बढई ने प्लेन कर दियाऔर फिर माँ ने उसका नामकरण दुखहरण दास कर दिया क्योकि माँ के अनुसार वह हमारे सारे दुःख दूर कर देतालकड़ी का वो लावारिस टुकड़ा हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बन गया और फिर हम भाई-बहनों ने एक बेहद ही गुप्त मीटिंग बुलाई जिसमे हमें अपने इस नए दुश्मन से निजात पाने की तरकीब सोचनी थीअंतत: हमने उसको एक गुप्त स्थान पर छुपाने का प्रस्ताव पारित किया जहाँ माँ-पापा का ध्यान जा सके और यह काम मुझे सौपा गयामैंने यह काम बहुत होशियारी से किया पर हममे से ही एक ने मिठाई के लालच में सारे राज पापा के सामने उगल दिएपापा ने उस जगह से दुखहरण को लाकर बेहद ही सुरक्षा के साथ आलमारी में रख दियाअब उसको आलमारी में से तभी निकाला जाता जब माँ या पापा को हमें इनाम देने की जरुरत पड़तीहालाँकि उस दुखहरण के कारण भी हमारी मस्तियों या बदमाशियों पर कोई लगाम लगाहम हर दिन रात को माँ से ये वादा करते की अगले दिन दोपहर को घर में आराम करेंगे पर यह वादा कभी पूरा होता
   बचपन की एक और चीज जो मुझे सबसे ज्यादा याद आती है वो थी मेरी दादी की कहानियाहमारी दादी, जिन्हें हम "ईया जी" कहा करते थे, अक्सर रात में सोने से पहले हमें हर रोज एक नयी कहानी सुनाया करती थीमुझे ये नहीं समझ में आता की आखिर उनको इतनी कहानिया याद कहाँ से थीहाँ, उनकी हर नयी कहानी में एक राजा होता था जो शुरू में बहुत अमीर होता पर बाद में गरीब हो जाता थापर कहानी का अंत क्या होता था ये मुझे कभी पता नहीं चलाक्योकि हम सब कहानी ख़त्म होने से पहले ही सो जाते थे और अगले दिन फिर से एक नयी कहानी। 
   घर में हम माँ से भी ज्यादा अपनी बुआ से डरते थेवो हमारे लिए हिटलर थीउनका हमारे ऊपर शासन तानाशाही से काम नहीं थाऔर वो भी हमेशा सी.आई.डी. की तरह सारे काम छोड़कर हमारे ही पीछे पड़ी रहती थीऔर कई बार तो बिना गलती किये भी हमें उनसे इनाम मिल जाता थाबाद में जब उनकी शादी हुई तो विदाई के समय घर के सभी बड़े रो रहे थे और हम बच्चे सबसे ज्यादा खुश हो रहे थेयह हमारे लिए "हिटलर साम्राज्य" का पतन थापर जब उनके जाने के बाद हमें अपने कपडे खुद से धोने पड़े तब हमें उनकी सबसे ज्यादा कमी खली। 
   आज जब इन सब बातो को बीते हुए १० साल से ज्यादा हो चुके थे, तब बालकनी में बैठे हुए फिर से सारी बाते याद गयीबगीचे का हमारा वो गुल्ली-डंडा और टिकोले का सलाद फिर कभी मिलामै पढाई में अच्छा करने पर शहर चला आया और मेरे सारे दोस्त वहीँ गाँव में छुट गएअब घर से दूर यहाँ आई.आई.टी. में पिछले दो सालो से अकेला रह रहा हूँमेस के खाने को देखकर माँ के रोटियों की याद जाती है और कपडे धोते वक़्त हिटलर बुआ की याद जाती हैअब जब भी रात में देर तक जग कर असाइंमेंट करता हूँ तो दाड़ी जी  की कहानिया याद जाती हैआज उन सब चीजी को खो देने के बाद एक बार फिर से पाना चाहता हूँ, आज माँ, पापा, ईया जी और हिटलर बुआ के साथ कुछ देर के लिए सुकून के साथ समय गुजरना चाहता हूँ पर वक़्त नहीं हैईया जी अब इस दुनिया में नहीं रही, बुआ की शादी हो गयी और वो अपने ससुराल रहती हैंछुट्टियों में कुछ दिन के लिए घर जाता हूँ तो माँ की बनाई रोटी मिलती है पर सिर्फ कुछ दिनों के लिए
   खैर इतना सब सोचते सोचते रात हो चली थीमैंने स्मृति के किताब के पन्नो को यहीं बंद कर वापस रूम में जान उचित समझाअब मेरे पास पुरानी यादों के लिए भी वक़्त नहीं थाक्योकि दुनिया तेजी से चल रही थी और इसके साथ मुझे भी चलना था। 

Sunday, 11 March 2012

क्या लिखू....


कुछ जीत लिखू या हार लिखू,
या दिल का सारा प्यार लिखू,
कुछ अपनों के जज्बात लिखू या सपनो के सौगात लिखूं,
मैं खिलता सूरज आज लिखू या चेहरा चाँद गुलाब लिखूं,
वो डूबते सूरज को देखू या खिलते फूल की सांस लिखू,
पल में बीते साल लिखू या सदियों लम्बी रात लिखू,
मैं तुमको अपने पास लिखू या दूरी का एहसास लिखू,
मैं अंधे के दिल में झाँकू या आँखों की मै रात लिखू,
मीरा के पायल को सुनलू, या गौतम की मुस्कान लिखूं,
बचपन के बच्चों से खेलु या जीवन की ढलती शाम लिखूं,
सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का बिस्तार लिखूं,
वो पहली पहली प्यास लिखू या निश्छल पहला प्यार लिखू,
सावन की बारिश में मैं भीगू या आँखों की बरसात लिखूं,
गीता का अर्जुन हो जाऊं या लंका रावन राम लिखूं,
मैं हिन्दू मुस्लिम हो जाऊं या एक बेबस इंसान लिखूं,
मैं एक ही मजहब को जीलू या मज़हब की आँखें चार लिखूं,
क्या लिखू,
कुछ जीत लिखू या हार लिखूं,
या दिल का सारा प्यार लिखूं