कई बार हम अपने जिंदगी में ऐसे मोड़ पर पहुँच जाते है जहाँ हम खुद को कोई फैसला लेने में असक्षम पाते हैं। जहाँ हमारे सामने कई विकल्प होते हैं, और हमें उनमे से कोई एक चुनना होता है। और हर एक विकल्प हमारे जिंदगी को एक नयी दिशा देता है पर हम सिर्फ एक के साथ जा सकते हैं। यहाँ हम खुद को गहरे अंतर्द्वंद में पाते हैं। एक तरफ हमारे दिल की कुछ और मांग होती है तो दूसरी तरफ दिमाग कुछ और सोचता है। हमें अपने ख़ुशी और अपने मज़बूरी में से किसी एक को चुनना होता है। चुनाव की यह दशा हमारे लिए बेहद कठिन हो जाती है क्योकि इस चुनाव से हमारा भविष्य जुड़ा होता है। और हम अपने भविष्य को जोखिम में नहीं डालना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में हमें जरुरत होती है अपने किसी ऐसे की जो हमें बेहतर सुझाव देकर हमारी मदद कर सके। ऐसे में हम अपने बड़ो से मिलते हैं जिन्होंने जिंदगी में कभी इस परिस्थिति का सामना किया होता है, और उनको इसका अनुभव होता है। हम उनसे आशा करते है की शायद उनका सुझाव हमारे किसी काम आ सके। पर कहते हैं न, "जितनी मुंह उतनी बातें", ऐसा ही कुछ यहाँ भी होता है। हम जितने लोगो से मिलते हैं, हमें उतने ही प्रकार के अलग अलग सुझाव मिलते हैं। कोई किसी एक रास्ते को सही बोलता है तो दूसरा उसे गलत। बात अनुभवों की है, किसी को वो रास्ता अच्छा लगा, उसने उस रास्ते को चुनकर जिंदगी में तरक्की की, तो वह हमें भी वहीँ सुझाव देता है। तो दूसरा इंसान, जो उसे बुरा बोलता है, उसको इस रास्ते के साथ बुरे अनुभव हैं। और अंत में, हम खुद को वहीँ पाते हैं जहाँ हम शुरू में थे। उसी अंतर्द्वंद में फंसे हुए की क्या करे, किससे पूछे।
बीते दिनों मेरे साथ भी कुछ ऐसी ही समस्या आ गयी थी। जब मुझे अपने कैरियर से जुड़ा एक चुनाव करना था। मै खुद को अजीब स्थिति में पा रहा था। मै समझ नहीं पा रहा था की मै क्या करूँ। मै एक रास्ते को चुनना चाहता था, पर बार-बार ये सोच रहा था की कहीं ऐसा करके मै अपने भविष्य को जोखिम में तो नहीं डाल रहा हूँ। भविष्य का डर मुझे कोई निर्णय न लेने के लिए मजबूर कर रहा था। मै असमंजस में पडा सोच रहा था की क्या करू। फिर सोचा, अपने सीनियर्स से पुछू, शायद उनको इस बात का अनुभव हो। पर कोई फायदा नहीं हुआ। किसी ने कुछ और सुझाव दिया और किसी ने कुछ और। सबने अपनी अपनी बाते बताई। पर मेरा दिमाग किसी भी बात से संतुष्ट नहीं हुआ। जब मै वापस लौटा तो फिर वहीँ सवाल, क्या करूँ....?????
अपने कमरे में काफी देर तक बैठे हुए मै खुद को एक निर्णय पर पहुचाने की कोशिश कर रहा था। पर बार-बार दिल और दिमाग में बहस छिड़ जा रही थी, दिल खुशियों को देख रहा था और दिमाग भविष्य को। रह-रह कर मन में सीनियर्स द्वारा कही हुई बाते भी आ रही थी। सोचता था, कहीं यह निर्णय लेकर मै खुद को संकट में तो न डाल लूँगा। कहीं मेरा यह निर्णय मेरे करियर के लिए कोई समस्या तो न बन जाए। इन सब बातो ने मुझे बड़ी अजीब स्थिति में डाल दिया था। आज मै कितना बेबस सा हो गया था। भविष्य के डर से मै अपने जीवन का एक निर्णय नहीं ले पा रहा था। आज मेरे पास इतनी भी हिम्मत न थी की मै अपने निर्णय को सही साबित कर सकू। और आज मुझे अपनी जिदगी के बारे में दुसरे से पूछना पर रहा था। मुझे खुद के इस कमजोरी पर गुस्सा आ रहा था। कमरे में बैठा हुआ यहीं सोच रहा था की मेरे एक दोस्त ने मुझे फ़ोन किया। फ़ोन पर भी मै उससे सही से बात नहीं कर पा रहा था, फिर उसने मेरे उलझन का कारण पुछा, और मैंने उसको सारी बात बता दी। सुनकर उसने हँसते हुए कहा की बस इतनी सी बात है और तुम इसके लिए इतना तनाव में हो। मुझे उसपर गुस्सा भी आ रहा था, मेरी इतनी बड़ी समस्या को वह इतना छोटा कैसे समझ कर मेरे ऊपर हंस रहा था। उसने हँसते हुए कहा की यह जिंदगी मेरी हैं, और चुनाव मुझे करना है तो फिर मै दुसरो से क्यों पूछ रहा हूँ। मुझे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने चाहिए और फिर खुद में इतना जज्बा होना चाहिए की उसको सही साबित कर सकू। जितना और हारना, ये तो जिंदगी के दो पहलू हैं, इनसे क्या घबराना।
और अंत में मैंने वही किया जो मै चाहता था। हाँ, इतना संकल्प जरुर था की अपने इस फैसले को सही साबित करने के लिए मै कुछ भी कर दूंगा। जिंदगी मेरी तो फिर फैसला मेरा। जीत गया तो मेरी जीत और हार गया तो कुछ सिखने को तो जरुर मिलेगा। वैसे भी, ये जिंदगी का एक और नया अनुभव था।