My Past, Present and Future…..

Monday, 3 September 2012

संत के नाम पर धब्बा


    अभी अभी न्यूज़-चैनल पर एक न्यूज़ देखकर मन को बड़ा आघात पंहुचा। मन में एक सवाल उठने लगा की क्या यहीं है भारत की गौरवशाली संस्कृती का उदाहरण। क्या हम आज इसी संस्कार और संस्कृती के लिए खुद पर फक्र करते हैं। आज हम अक्सर कहते है की हमारी सभ्यता और हमारा गौरवशाली अतीत दुनिया के बाकी सभ्यताओं से ज्यादा विकसित है। पर आये दिन समाज में ऐसी घटनाये होती रहती हैं जो हमें एक बार आत्म-चिंतन करने के लिए मजबूर कर देती हैं। ये घटनाये हमारी सभ्यता के ऊपर कई सवाल खड़े करती हैं। अगर हमने आजतक यहीं सिखा है तो हमें कोई हक़ नहीं की हम अपने सभ्यता-संस्कृती पर इतना गर्व करे, बल्कि हमें तो शर्म करनी चाहिए। मानवता के नाम को कलंकित करने वाली इन घटनावों को और इनको अंजाम देने वाले के लिए हमारे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ऐसे लोग समाज रूपी शरीर पर एक घाव के सामान है  जो हमेशा शरीर को दुर्गन्ध और दर्द से युक्त ही रखता है। ऐसे घाव को शरीर से काट कर हटा देने में ही भलाई है।
    खुद को संत कहने वाले और जनता को अपने सत्संगो के माध्यम से प्रेम और भाईचारे का पाठ पढ़ाने वाले पंडित आसाराम बापू ने जो कृत्य आज किया है उसके लिए वे क्षमा के योग्य नहीं हैं। जनमानस का एक बड़ा हिस्सा उनको अपना गुरु मानता है और उनके बताये सिधान्तो का अनुसरण करता है। पर क्या यहीं है उनके सिधांत की अगर कोई आपकी बात नहीं माने तो आप उसे खुलेआम पूरी भीड़ के सामने थप्पड़ मार कर जलील करे। तो फिर आपमें और हिटलर में क्या अंतर रह जायेगा। हिटलर को भी अपने फैसले जबरदस्ती लोगो पर थोपने की आदत थी और आपको भी। हाँ, अंतर यही है की हिटलर खुद को किसी महान संस्कृति का हिस्सा नहीं बताता था। पर शायद इन गुरुओं ने जनमानस के श्रद्धा को अपना हक़ समझ लिया है और ये इस ग़लतफ़हमी में बैठ गए हैं की ये जो भी करेंगे सही होगा।
    आज पंडित आसाराम बापू ने गाज़ियाबाद के पास एक साक्षात्कार के दौरान एक कैमरामैन को पूरी भीड़ के सामने थप्पड़ मार दिया। उस कैमरामैन की गलती सिर्फ इतनी ही थी की उसने इनके कहने के वावजूद इनके भक्तो की तस्वीर नहीं ली। अपने इस आजाद भारत में मैंने मिडिया की आजादी के बारे में सुना था पर मुझे ये पता नहीं था की मिडिया की ये आजादी इन संतो के सत्संगो ने ख़त्म हो जाती है। हद तो तब हो गयी जब इन्होने बजाय माफ़ी मांगने के, उस कैमरामैन पर झूठा आरोप लगाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, ये गुरूजी महाराज यहीं नहीं रुके, लगे हाथो इन्होने अपनी बात नहीं मानने पर जनता के द्वारा चुनी हुई एक सरकार को भी उखाड़ फेकने की चुनौती दे डाली। इनके कृत्यों से इनका हिटलरी तरीका साफ़ झलक रहा है। ये जनमानस का उनके प्रति दिखाए गए श्रद्धा के भाव को अपना अधिकार समझ बैठे हैं। और इस मद में इतने ज्यादा चूर हो गए हैं की इन्हें सही और गलत में अंतर नहीं समझ आ रहा है। ये संत शायद भूल गए हैं की जनता की भावनावो  से खेलने का अंजाम बहुत बुरा होता है। और जनता किसी को सर-आँखों पर बिठाना जानती है तो उसे धुल में मिलाना भी जानती हैं।
    मुझे ये नहीं समझ आता की आगे अब ये किस मुंह से से जनता को प्रेम और भाईचारे का उपदेश देंगे। क्या इन्हें तब शर्म नहीं आएगी जब ये अपने भक्तो को अपना गुस्सा काबू करने का और क्षमा करने का पाठ पढ़ाएंगे। और अब इनके भक्तो को भी एक बार ये सोचना चाहिए की जो इन्सान खुद को काबू में नहीं रख सकता वह दुसरे को क्या काबू में रहना सिखाएगा।
    अकूत सम्पति के मालिक आसाराम बापू आज हलिकोप्टर में यात्रा करते है पर अगर जनता ने एक बार ठान ली तो इन्हें धुल में मिलकर छोड़ेगी। इसलिए संभल जाईये, जनता अगर प्यार और इज्जत देना जनता है तो नफरत और सजा को भी नहीं भूली है।

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