सपने देखने का अधिकार तो सबको होता है। सपने देखने का जितना अधिकार आपको है उतना ही मुझे। और मैंने अपने इस अधिकार का पूरा इस्तेमाल किया है। इन खुली आँखों से अकेले में मैंने भी कुछ सपने देखे हैं। आने वाले कल के लिए कुछ सपने है मेरे मन में तो बीते हुए कल की कुछ यादे और इनसे सिखा हुआ कुछ अनुभव। इन्ही यादों और अनुभवों के साथ आने वाले कल से कुछ आशाएं लगा रखी है मैंने। मै जानता हूँ की हमें आने वाले कल से कुछ आशा नहीं करनी चाहिए पर मानव-मन बहुत कमजोर होता है जो सत्य और असत्य की परिभाषा जानते हुए भी उनमे अंतर नहीं कर पाता है। मैने भी जाने अनजाने कई आशाएं मन में संजो ली हैं। हाँ, मैंने इनके पूरे होने की शर्त नहीं रखी है, क्योकि सपने देखने का अधिकार हमें है, पर उसके पूरे होने का निर्णय करना तो भगवान् के हाथों में है।
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| बायोटेक्नोलोजी लैब में |
मैं बिहार के सिवान जिले का रहने वाला हूँ। इस जिले के एक गाँव गोरेयाकोठी में मेरा जन्म हुआ था, सालो पहले, तब की बाते मुझे याद नहीं, क्योकि तब मै बहुत छोटा था। हाँ, माँ अक्सर बताती है की बचपन में मैं जरुरत से ज्यादा शैतान था। किसी भी उपयोगी सामान से मेरी दुश्मनी होती थी। मै अक्सर इनको या तो तोड़ देता या फिर कहीं फेंक देता जिससे ये किसी को न मिले। मुझे ना जाने क्यों, शुरू से ही ऐसे कामो में बड़ा आनंद मिलता था। मेरे ये कारनामे पूरे मोहल्ले में प्रसिद्ध थे। मोहल्ले का कोई भी सामान अगर गायब होता तो सबसे पहला शक मेरे ऊपर आता था। और लोग बिना सोचे समझे आनन्-फानन में मुझे अपराधी घोषित कर देते। पर इसका नाजायज फायदा दुसरे लड़के उठाते थे। घर का कोई सामान मेरे भाई या बहन ने तोडा पर शक की सुई सबसे पहले मेरे ऊपर आती थी और बिना मेरे से पूछे मुझे तोड़ने का इनाम भी मिल जाता था (
मुझे ये बताने की जरुरत नहीं की इनाम में क्या मिलता था)। तब ऐसे इनाम पाने का मजा भी कुछ और था। क्योकि तब मेरी छोटी सी दुनिया में इन सब चीजो का महत्व कुछ ज्यादा ही था। समय बिता और इसके साथ मेरा बचपन भी बीत गया। मै बड़ा होता गया और मेरी शैतानिया कम होती गयी। किशोरावस्था में कदम रखने के साथ ही मैंने पढाई पर ध्यान देना शुरू कर दिया। मैंने गाँव में ही रहकर दसवी तक की पढाई की। तब न तो मेरे आँखों में बड़े सपने पलते थे और न ही बड़े सपनो का मतलब समझता था। पढाई के साथ घर का काम करना, गाये खिलाना, और बाजार से सामान लाना, और थोडा समय निकालकर खेलने भाग जाना बस यहीं मेरी दिनचर्या हुआ करती थी। दसवी तक किरोसिन तेल के लैम्प में पढाई करके अच्छे मार्क्स लाने के बाद आगे की पढाई करने मै पटना चला आया। पहली बार किसी शहर में आया था। गाँव के छोटे-छोटे घरो में रहने का बाद शहर की इन बहुमंजिली इमारतो को देख कर चकित था मैं। छोटे गाँव के छोटे सपनो से निकलकर एक बड़े शहर में आने के बाद मुझे भी बड़े सपने देखने का हक़ मिल गया (
मेरा अभी भी ये भ्रम है की सिर्फ बड़े शहर के लोग ही बड़े सपने देख सकते हैं )। पटना के
पटना सेंट्रल स्कूल से मैंने बारहवी की पढाई की। बाईपास के किनारे बड़े से लाल रंग के स्कूल को देखकर मैंने यह समझ लिया था की स्कूल भी बहुत अच्छा है। हालाँकि मेरा यह भ्रम कुछ दिनो के अन्दर ख़त्म हो गया। इस लाल रंग की विशाल इमारत से मेरा मन एक साल के अन्दर ही इतना ऊब गया की मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया। शुरू से ही आजादी मेरे रग़-रग़ में भरी हुई थी, जहाँ थोड़ी सी आजादी मिली, वहीँ मेरी मस्तिया शुरू हो जाती थी। 2008 का पूरा साल मैंने अपनी मस्तियो में बिता दिया। पर मेरी आँख तब खुली जब 2009 की शुरुआत हुई। तिन महीने के अन्दर मेरा बोर्ड एक्जाम होने वाला था और मेरी तैयारी जीरो थी। जैसे-तैसे हड़बड़ी में जो कुछ कर सकता था, इन तिन महीनो के अन्दर किया और बोर्ड का एक्जाम दे दिया। बोर्ड एक्जाम के रिजल्ट अपेक्षा से ज्यादा अच्छे निकले। बारहवी की परीक्षा पास करने के बाद मैंने आई.आई.टी का एक्जाम दिया और उसमे सफलता प्राप्त करने के बाद मैंने आई.आई.टी मद्रास में एडमिशन ले लिया। अभी मै
आई.आई.टी मद्रास में
बायोटेक्नोलोजी डिपार्टमेंट का थर्ड ईयर का छात्र हूँ।
आज मै देश के एक बड़े शहर में रहता हूँ एक बड़े कॉलेज में पढता हूँ, और बड़े सपने देखता हूँ। हाँ, मेरे बड़े सपने शहर के रहने वाले उन बाकी बच्चो के बड़े सपनो से अलग हैं। इन बच्चो के बड़े सपनो में एक अच्छी सी नौकरी, एक बड़ा घर और सोसाइटी में एक बड़ा इज्जत होता है (
बड़ी इज्जत का मतलब मै भी नहीं समझता)। पर मैं एक गाँव की मिटटी से आया हूँ। मैंने धुल में पड़े उन बच्चो की आँखों में पल रहे अधूरे सपने को देखा है जो कभी पूरे नहीं हो पाते। मैंने अमीरों की मार सहने वाले गरीबो के दर्द को देखा है, जो इन अमीरों के पैरों तले रौदे जाते हैं। मैंने उस कमजोर वृद्ध किसान को देखा है जिसके पास खड़े होने की शक्ति भी नहीं है पर फिर भी काम कर रहा है क्योकि उसे डर है की कहीं कल की तरह आज भी चूल्हा ठंडा न रह जाये। मैंने बीमारी से मरते हुए लोगो को देखा है जिसके पास डॉक्टर और दवा के पैसे नहीं थे।
मेरा सपना न तो इस गरीब किसान को खाना देने का है ना ही इस बीमार को दवा के पैसे देने का है। और ना ही मै गरीबो को अमीरों के अत्याचार से बचाने जा रहा हूँ। मेरा तो बस एक छोटा सा सपना है, उस धुल में पड़े हुए बच्चे की आँखों में पल रहे अधूरे सपने को पूरा करना। मै उसके सपनो को हकीकत में बदलना चाहता हु, क्योकि मै जानता हूँ की अगर उसका सपना पूरा हो जायेगा, अगर उसने जिंदगी में पढाई कर ली, तो शायद वो दस और बच्चो के सपनो को पूरा करने की कोशिश करेगा और फिर वो दस सौ की..... । फिर मेरे गाँव में कोई गरीब न रहेगा। तब ये अमीर किसी पर अपना ज़ुल्म नहीं कर पाएंगे। तब कोई कमजोर किसान भूख के लिए नहीं तडपेगा और ना कोई रोगी दवा के पैसे न होने के कारण मरेगा।
आज इन्ही सपनो को अपने आँखों में संजोये आने वाले कल का इन्तजार कर रहा हूँ............ ।