रूप की धुप गर्म होती हैं,
कली है कली, नर्म होती हैं,
धीरे धीरे चलना कहारों,
डोली का पर्दा न हिले,
क्योकि नयी दुल्हन में शर्म होती हैं।
बात तब की है जब में आठवी कक्षा का छात्र था। तब में अपने गाँव में रहता था और गाँव में एक समाचार पत्र बड़ा मशहूर था, 'हिंदुस्तान'। इसी समाचार पत्र के संपादकीय पृष्ठ पर मैंने एक दिन यह लाइन पढ़ी... पढ़कर मुझे भारतीय संस्कृति का वो पारंपरिक जमाना याद आ गया जब दुल्हने डोली में बैठा कर पिया के घर विदा की जाती थी। तब से अब तक काफी समय बीत गया और अब मै शहर के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज का छात्र हूँ पर आज भी यह लाइन मुझे वैसे ही हु-ब-हु याद हैं।
अब जब भी अपने चारो तरफ देखता हूँ, सिर्फ आधुनिकता ही दिखती है। और इस आधुनिकता में आधुनिकता कम और दिखावापन ज्यादा हैं। आज न तो कोई दुल्हन डोली में विदा होती है और न ही कोई दूल्हा घोड़ी चढ़कर आता हैं। घोड़ी और डोली का स्थान बड़ी-बड़ी कारो ने ले लिया हैं। विदा होते समय न दुल्हन के आँख से आंसू गिरते हैं और और ना बाबुल का घर छुटने का गम होता हैं। अब दुल्हने विदाई के समय यह गाना गाती हैं...
चल री सजनी अब क्या सोचे,
कजरा ना बह जाए रोते रोते,
उनको विदाई के समय भी अपने कजरे और सुन्दरता का ध्यान रहता हैं, क्योकि इस आधुनिकता में सुन्दरता के दीखावेपन का बहुत बड़ा स्थान हैं। हाँ, गांवो में अब भी थोड़े रीती-रिवाज बचे हुए हैं तो शहरों में आधुनिक पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने इन सब को दकियानूस बताकर इनसे किनारा कर लिया है। शहरी पढ़े लिखे ट्रेंड लोगो के पास वक़्त नहीं होता है इन सब रीती रिवाजो के लिए। इन शहरी लोगो के लिए शादी सात जन्मो का बंधन नहीं, एक बिजीनेस डील हो गया हैं, जिसमे मंत्रो के बारे में कम और 'टर्म्स एंड कंडीशन' के बारे में ज्यादा सोचा जाता हैं। और ऐसी शादियाँ अब बिजीनेस के सामान ही हो गयी हैं। ये शादिय तब तक ही चलती हैं जब तक की ये सारे 'टर्म्स एंड कंडीशन' पूरे किये जाते हैं। ये शादियाँ कच्चे धागे से भी ज्यादा कमजोर होती हैं जो कभी भी टूट सकती हैं। पति-पत्नी का छोटी-छोटी बातो पर झगड़ना आम बात हो गया है। और हद तो तब हो जाती हैं, जब इन झगड़ो को आये दिन पति पत्नी कोर्ट में लेकर जाते हैं। जिसके साथ सारी जिंदगी साथ रहने की कसमे खानी थी उनपर कोर्ट में एक से बढ़कर एक झूठे आरोप लगाये जाते हैं। आपसी झगडे, जिनका समाधान उन्हें खुद घर में बैठकर कर लेना चाहिए, उसके लिए कोर्ट के जज और वकील की जरुरत पड़ती हैं। और तब ये शहरी पढ़े लिखे खुद को मॉडर्न बोलते हैं। लानत हैं ऐसी मॉडर्नाइजेशन पर। उस मॉडर्नाइजेशन का मतलब ही क्या जिसमे इंसान रिश्तो का मतलब ही न समझे। जहाँ रिश्तो में प्यार कम और लाभ-हानि ज्यादा हो। जहाँ घर की बाते बाहर वाले सुलझाये।इनसे तो अच्छे हम गांववाले हैं। हम गवांर सही पर रिश्तो का मतलब तो जानते हैं। हम शायद पढाई की बड़ी-बड़ी बाते न समझ पाए, प्यार की भाषा तो समझते हैं। हम आधुनिकता के मद में पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करने के बजाय अपने विशाल भारतीय संस्कृति का हिस्सा होना पसंद करते हैं।
मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं, पर पश्चिमी सभ्यता का विरोधी हूँ। मै उन लोगो का विरोधी हूँ जो आधुनिक होने के चक्कर में आंख मूंद कर पश्चिमी सभ्यता और नग्नता का अनुसरण कर रहे हैं। आज भी हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति का दुनिया के विद्वान लोहा मानते हैं, पर हम अपने ही घर में इन कथित मॉडर्न लोगो से हार जाते हैं। इन मॉडर्न लोगो से मै बस इतना ही अनुरोध करूँगा की एक बार जरा सोचना "कहीं मॉडर्न होने के चक्कर में तुम कई कीमती रिश्ते तो नहीं खो रहे हो।"
