My Past, Present and Future…..

Saturday, 3 November 2012

रिश्तो की आधुनिकता

रूप की धुप गर्म होती हैं,
कली है कली, नर्म होती हैं,
धीरे धीरे चलना कहारों, 
डोली का पर्दा न हिले,
क्योकि नयी दुल्हन में शर्म होती हैं।

   बात तब की है जब में आठवी कक्षा का छात्र था। तब में अपने गाँव में रहता था और गाँव में एक समाचार पत्र बड़ा मशहूर था, 'हिंदुस्तान'। इसी समाचार पत्र के संपादकीय पृष्ठ पर मैंने एक दिन यह लाइन पढ़ी... पढ़कर मुझे भारतीय संस्कृति का वो पारंपरिक जमाना याद आ गया जब दुल्हने डोली में बैठा कर पिया के घर विदा की जाती थी। तब से अब तक काफी समय बीत गया और अब मै शहर के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज का छात्र हूँ पर आज भी यह लाइन मुझे वैसे ही हु-ब-हु याद हैं।
अब जब भी अपने चारो तरफ देखता हूँ, सिर्फ आधुनिकता ही दिखती है। और इस आधुनिकता में आधुनिकता कम और दिखावापन ज्यादा हैं। आज न तो कोई दुल्हन डोली में विदा होती है और न ही कोई दूल्हा घोड़ी चढ़कर आता हैं। घोड़ी और डोली का स्थान बड़ी-बड़ी कारो ने ले लिया हैं। विदा होते समय न दुल्हन के आँख से आंसू गिरते हैं और और ना बाबुल का घर छुटने का गम होता हैं। अब  दुल्हने विदाई के समय यह गाना गाती हैं...
चल री सजनी अब क्या सोचे,
कजरा ना बह जाए रोते रोते,
   उनको विदाई के समय भी अपने कजरे और सुन्दरता का ध्यान रहता हैं, क्योकि इस आधुनिकता में सुन्दरता के दीखावेपन का बहुत बड़ा स्थान हैं। हाँ, गांवो में अब भी थोड़े रीती-रिवाज बचे हुए हैं तो शहरों में आधुनिक पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने इन सब को दकियानूस बताकर इनसे किनारा कर लिया है। शहरी पढ़े लिखे ट्रेंड लोगो के पास वक़्त नहीं होता है इन सब रीती रिवाजो के लिए। इन शहरी लोगो के लिए शादी सात जन्मो का बंधन नहीं, एक बिजीनेस डील हो गया हैं, जिसमे मंत्रो के बारे में कम और 'टर्म्स एंड कंडीशन' के बारे में ज्यादा सोचा जाता हैं। और ऐसी शादियाँ अब बिजीनेस के सामान ही हो गयी हैं। ये शादिय तब तक ही चलती हैं जब तक की ये सारे 'टर्म्स एंड कंडीशन' पूरे किये जाते हैं। ये शादियाँ कच्चे धागे से भी ज्यादा कमजोर होती हैं जो कभी भी टूट सकती हैं। पति-पत्नी का  छोटी-छोटी बातो पर झगड़ना आम बात हो गया है। और हद तो तब हो जाती हैं, जब इन झगड़ो को आये दिन पति पत्नी कोर्ट में लेकर जाते हैं। जिसके साथ सारी जिंदगी साथ रहने की कसमे खानी थी उनपर कोर्ट में एक से बढ़कर एक झूठे आरोप लगाये जाते हैं। आपसी झगडे, जिनका समाधान उन्हें खुद घर में बैठकर कर लेना चाहिए, उसके लिए कोर्ट के जज और वकील की जरुरत पड़ती हैं। और तब ये शहरी पढ़े लिखे खुद को मॉडर्न बोलते हैं। लानत हैं ऐसी मॉडर्नाइजेशन पर। उस मॉडर्नाइजेशन का मतलब ही क्या जिसमे इंसान रिश्तो का मतलब ही न समझे। जहाँ रिश्तो में प्यार कम और लाभ-हानि ज्यादा हो। जहाँ घर की बाते बाहर वाले सुलझाये।
   इनसे तो अच्छे हम गांववाले हैं। हम गवांर सही पर रिश्तो का मतलब तो जानते हैं। हम शायद पढाई की बड़ी-बड़ी बाते न समझ पाए, प्यार की भाषा तो समझते हैं। हम आधुनिकता के मद में पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करने के बजाय अपने विशाल भारतीय संस्कृति का हिस्सा होना पसंद करते हैं।
   मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं, पर पश्चिमी सभ्यता का विरोधी हूँ। मै उन लोगो का विरोधी हूँ जो आधुनिक होने के चक्कर में आंख मूंद कर पश्चिमी सभ्यता और नग्नता का अनुसरण कर रहे हैं।  आज भी हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति का दुनिया के विद्वान लोहा मानते हैं, पर हम अपने  ही घर में इन कथित मॉडर्न लोगो से हार जाते हैं। इन मॉडर्न लोगो से मै बस इतना ही अनुरोध करूँगा की एक बार जरा सोचना "कहीं मॉडर्न होने के चक्कर में तुम कई कीमती रिश्ते तो नहीं खो रहे हो।"

Tuesday, 2 October 2012

एक सपना मेरा भी


   सपने देखने का अधिकार तो सबको होता है। सपने देखने का जितना अधिकार आपको है उतना ही मुझे। और मैंने अपने इस अधिकार का पूरा इस्तेमाल किया है। इन खुली आँखों से अकेले में मैंने भी कुछ सपने देखे हैं। आने वाले कल के लिए कुछ सपने है मेरे मन में तो बीते हुए कल की कुछ यादे और इनसे सिखा हुआ कुछ अनुभव। इन्ही यादों और अनुभवों के साथ आने वाले कल से कुछ आशाएं लगा रखी है मैंने। मै जानता हूँ की हमें आने वाले कल से कुछ आशा नहीं करनी चाहिए पर मानव-मन बहुत कमजोर होता है जो सत्य और असत्य की परिभाषा जानते हुए भी उनमे अंतर नहीं कर पाता है। मैने भी जाने अनजाने कई आशाएं मन में संजो ली हैं। हाँ, मैंने इनके पूरे होने की शर्त नहीं रखी है, क्योकि सपने देखने का अधिकार हमें है, पर उसके पूरे होने का निर्णय करना तो भगवान् के हाथों में है।
बायोटेक्नोलोजी लैब में
   मैं बिहार के सिवान जिले का रहने वाला हूँ। इस जिले के एक गाँव गोरेयाकोठी में मेरा जन्म हुआ था, सालो पहले, तब की बाते मुझे याद नहीं, क्योकि तब मै बहुत छोटा था। हाँ, माँ अक्सर बताती है की बचपन में मैं जरुरत से ज्यादा शैतान था। किसी भी उपयोगी सामान से मेरी दुश्मनी होती थी। मै अक्सर इनको या तो तोड़ देता या फिर कहीं फेंक देता जिससे ये किसी को न मिले। मुझे ना जाने क्यों, शुरू से ही ऐसे कामो में बड़ा आनंद मिलता था। मेरे ये कारनामे पूरे मोहल्ले में प्रसिद्ध थे। मोहल्ले का कोई भी सामान अगर गायब होता तो सबसे पहला शक मेरे ऊपर आता था। और लोग बिना सोचे समझे आनन्-फानन में मुझे अपराधी घोषित कर देते। पर इसका नाजायज फायदा दुसरे लड़के उठाते थे। घर का कोई सामान मेरे भाई या बहन ने तोडा पर शक की सुई सबसे पहले मेरे ऊपर आती थी और बिना मेरे से पूछे मुझे तोड़ने का इनाम भी मिल जाता था (मुझे ये बताने की जरुरत नहीं की इनाम में क्या मिलता था)। तब ऐसे इनाम पाने का मजा भी कुछ और था। क्योकि तब मेरी छोटी सी दुनिया में इन सब चीजो का महत्व कुछ ज्यादा ही था। समय बिता और इसके साथ मेरा बचपन भी बीत गया। मै बड़ा होता गया और मेरी शैतानिया कम होती गयी। किशोरावस्था में कदम रखने के साथ ही मैंने पढाई पर ध्यान देना शुरू कर दिया। मैंने गाँव में ही रहकर दसवी तक की पढाई की। तब न तो मेरे आँखों में बड़े सपने पलते थे और न ही बड़े सपनो का मतलब समझता था। पढाई के साथ घर का काम करना, गाये खिलाना, और बाजार से सामान लाना, और थोडा समय निकालकर खेलने भाग जाना बस यहीं मेरी दिनचर्या हुआ करती थी। दसवी तक किरोसिन तेल के लैम्प में पढाई करके अच्छे मार्क्स लाने के बाद आगे की पढाई करने मै पटना चला आया। पहली बार किसी शहर में आया था। गाँव के छोटे-छोटे घरो में रहने का बाद शहर की इन बहुमंजिली इमारतो को देख कर चकित था मैं। छोटे गाँव के छोटे सपनो से निकलकर एक बड़े शहर में आने के बाद मुझे भी बड़े सपने देखने का हक़ मिल गया (मेरा अभी भी ये भ्रम है की सिर्फ बड़े शहर के लोग ही बड़े सपने देख सकते हैं )। पटना के पटना सेंट्रल स्कूल से मैंने बारहवी की पढाई की। बाईपास के किनारे बड़े से लाल रंग के स्कूल को देखकर मैंने यह समझ लिया था की स्कूल भी बहुत अच्छा है। हालाँकि मेरा यह भ्रम कुछ दिनो के अन्दर ख़त्म हो गया। इस लाल रंग की विशाल इमारत से मेरा मन एक साल के अन्दर ही इतना ऊब गया की मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया। शुरू से ही आजादी मेरे रग़-रग़ में भरी हुई थी, जहाँ थोड़ी सी आजादी मिली, वहीँ मेरी मस्तिया शुरू हो जाती थी। 2008 का पूरा साल मैंने अपनी मस्तियो में बिता दिया। पर मेरी आँख तब खुली जब 2009 की शुरुआत हुई। तिन महीने के अन्दर मेरा बोर्ड एक्जाम होने वाला था और मेरी तैयारी जीरो थी। जैसे-तैसे हड़बड़ी में जो कुछ कर सकता था, इन तिन महीनो के अन्दर किया और बोर्ड का एक्जाम दे दिया। बोर्ड एक्जाम के रिजल्ट अपेक्षा से ज्यादा अच्छे निकले। बारहवी की परीक्षा पास करने के बाद मैंने आई.आई.टी का एक्जाम दिया और उसमे सफलता प्राप्त करने के बाद मैंने आई.आई.टी मद्रास में एडमिशन ले लिया। अभी मै आई.आई.टी मद्रास में बायोटेक्नोलोजी डिपार्टमेंट का थर्ड ईयर का छात्र हूँ।
   आज मै देश के एक बड़े शहर में रहता हूँ एक बड़े कॉलेज में पढता हूँ, और बड़े सपने देखता हूँ। हाँ, मेरे बड़े सपने शहर के रहने वाले उन बाकी बच्चो के बड़े सपनो से अलग हैं। इन बच्चो के बड़े सपनो  में एक अच्छी सी नौकरी, एक बड़ा घर और सोसाइटी में एक बड़ा इज्जत होता है (बड़ी इज्जत का मतलब मै भी नहीं समझता)। पर मैं एक गाँव की मिटटी से आया हूँ। मैंने धुल में पड़े उन बच्चो की आँखों में पल रहे अधूरे सपने को देखा है जो कभी पूरे नहीं हो पाते। मैंने अमीरों की मार सहने वाले गरीबो के दर्द को देखा है, जो इन अमीरों के पैरों तले रौदे जाते हैं। मैंने उस कमजोर वृद्ध किसान को देखा है जिसके पास खड़े होने की शक्ति भी नहीं है पर फिर भी काम कर रहा है क्योकि उसे डर है की कहीं कल की तरह आज भी चूल्हा ठंडा न रह जाये। मैंने बीमारी से मरते हुए लोगो को देखा है जिसके पास डॉक्टर और दवा के पैसे नहीं थे।
   मेरा सपना न तो इस गरीब किसान को खाना देने का है ना ही इस बीमार को दवा के पैसे देने का है। और ना ही मै गरीबो को अमीरों के अत्याचार से बचाने जा रहा हूँ। मेरा तो बस एक छोटा सा सपना है, उस धुल में पड़े हुए बच्चे की आँखों में पल रहे अधूरे सपने को पूरा करना। मै उसके सपनो को हकीकत में बदलना चाहता हु, क्योकि मै जानता हूँ की अगर उसका सपना पूरा हो जायेगा, अगर उसने जिंदगी में पढाई कर ली, तो शायद वो दस और बच्चो के सपनो को पूरा करने की कोशिश करेगा और फिर वो दस सौ की..... । फिर मेरे गाँव में कोई गरीब न रहेगा। तब ये अमीर किसी पर अपना ज़ुल्म नहीं कर पाएंगे। तब कोई कमजोर किसान भूख के लिए नहीं तडपेगा और ना कोई रोगी दवा के पैसे न होने के कारण मरेगा।

   आज इन्ही सपनो को अपने आँखों में संजोये आने वाले कल का इन्तजार कर रहा हूँ............ ।

Friday, 28 September 2012

शायद हमारी किस्मत में यहीं है....

हम वो पत्ता नहीं जो आंधी के आने का इंतज़ार करे
हम तो वो हैं की ख़ामोशी टूटी और वहां जा गिरे
जहाँ ना गाँव, ना घर, ना खेत, ना खलिहान
वहां सिर्फ शैतान ही शैतान....
चोट लगी, दर्द हुआ और आवाज आई
"तेरी किस्मत में यहीं हैं...."

हम वो फूल नहीं जो कोई दुसरो को दे खुश कर सके
हम तो वो हैं जिसपर भौरे भी बैठने से नकारते हैं
सुगंधहीन, कुरूप और लाचार,
जो आख़िरकार गिर जाते हैं
दर्द तो होता है और आवाज आती है
"तेरी किस्मत में यहीं हैं...."

हम वो नहीं जो महलों में रहे, बगीचों में टहले
हम तो वो हैं जिसे दुनिया ना तो प्यार देती है,
और ना इज्जत देती है,
वो करती भी है तो सिर्फ दिखावा
चोट दिल पे लगती है और दर्द बहुत होता है,
और फिर आवाज आती हैं
"तेरी किस्मत में यहीं है...."

ये दुनिया न तो बढ़ते देख सकती है किसीको ना हम जैसो को उठते
परिवार का साथ नहीं, किसी का याद नहीं
हम तो वो हैं जिसे दुनिया पैर की गंदगी और फलो की गुठलियाँ समझती हैं
जिसे खाने के बाद फेंक दिया
दर्द बहुत होता है और फिर आवाज आती है
"तेरी किस्मत में यहीं है...."

क्यों ऐसी जिंदगी मिली जहाँ रुलाया जाता है
हर वक़्त हर क्षण एक लाचार और बेबस होने का एहसास दिलाया जाता है
वक़्त पड़ते सभी ऐसे नजरे फेर लेते हैं
जैसे हमने अपनी बदकिस्मती, खुद ही लिखी है
चोट दिल पर लगती है और फिर आवाज आती है
"तेरी किस्मत में यहीं है...."


सोचा हैं रब को भी देनी है हमें एक अर्जी
क्यों नहीं होती है पूरी हमारी कोई मर्जी,
हार चुकी हु मै अपनी जिंदगी, ऐसी किस्मत से
वहीँ हो जाता है दूर जिसे जोड़ना चाहती हूँ अपने जीवन से
कोई उम्मीद नहीं रखना अब इस दुनिया से
कई चुनौतियों और ठोकरों से रु-ब-रु होते होते
शायद अब मैंने ये समझ लिया है
चोट दिल पर लगती है, दर्द बहुत होता है
और फिर समझ आती है
"शायद हमारी किस्मत में यहीं है...."

Monday, 3 September 2012

संत के नाम पर धब्बा


    अभी अभी न्यूज़-चैनल पर एक न्यूज़ देखकर मन को बड़ा आघात पंहुचा। मन में एक सवाल उठने लगा की क्या यहीं है भारत की गौरवशाली संस्कृती का उदाहरण। क्या हम आज इसी संस्कार और संस्कृती के लिए खुद पर फक्र करते हैं। आज हम अक्सर कहते है की हमारी सभ्यता और हमारा गौरवशाली अतीत दुनिया के बाकी सभ्यताओं से ज्यादा विकसित है। पर आये दिन समाज में ऐसी घटनाये होती रहती हैं जो हमें एक बार आत्म-चिंतन करने के लिए मजबूर कर देती हैं। ये घटनाये हमारी सभ्यता के ऊपर कई सवाल खड़े करती हैं। अगर हमने आजतक यहीं सिखा है तो हमें कोई हक़ नहीं की हम अपने सभ्यता-संस्कृती पर इतना गर्व करे, बल्कि हमें तो शर्म करनी चाहिए। मानवता के नाम को कलंकित करने वाली इन घटनावों को और इनको अंजाम देने वाले के लिए हमारे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ऐसे लोग समाज रूपी शरीर पर एक घाव के सामान है  जो हमेशा शरीर को दुर्गन्ध और दर्द से युक्त ही रखता है। ऐसे घाव को शरीर से काट कर हटा देने में ही भलाई है।
    खुद को संत कहने वाले और जनता को अपने सत्संगो के माध्यम से प्रेम और भाईचारे का पाठ पढ़ाने वाले पंडित आसाराम बापू ने जो कृत्य आज किया है उसके लिए वे क्षमा के योग्य नहीं हैं। जनमानस का एक बड़ा हिस्सा उनको अपना गुरु मानता है और उनके बताये सिधान्तो का अनुसरण करता है। पर क्या यहीं है उनके सिधांत की अगर कोई आपकी बात नहीं माने तो आप उसे खुलेआम पूरी भीड़ के सामने थप्पड़ मार कर जलील करे। तो फिर आपमें और हिटलर में क्या अंतर रह जायेगा। हिटलर को भी अपने फैसले जबरदस्ती लोगो पर थोपने की आदत थी और आपको भी। हाँ, अंतर यही है की हिटलर खुद को किसी महान संस्कृति का हिस्सा नहीं बताता था। पर शायद इन गुरुओं ने जनमानस के श्रद्धा को अपना हक़ समझ लिया है और ये इस ग़लतफ़हमी में बैठ गए हैं की ये जो भी करेंगे सही होगा।
    आज पंडित आसाराम बापू ने गाज़ियाबाद के पास एक साक्षात्कार के दौरान एक कैमरामैन को पूरी भीड़ के सामने थप्पड़ मार दिया। उस कैमरामैन की गलती सिर्फ इतनी ही थी की उसने इनके कहने के वावजूद इनके भक्तो की तस्वीर नहीं ली। अपने इस आजाद भारत में मैंने मिडिया की आजादी के बारे में सुना था पर मुझे ये पता नहीं था की मिडिया की ये आजादी इन संतो के सत्संगो ने ख़त्म हो जाती है। हद तो तब हो गयी जब इन्होने बजाय माफ़ी मांगने के, उस कैमरामैन पर झूठा आरोप लगाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, ये गुरूजी महाराज यहीं नहीं रुके, लगे हाथो इन्होने अपनी बात नहीं मानने पर जनता के द्वारा चुनी हुई एक सरकार को भी उखाड़ फेकने की चुनौती दे डाली। इनके कृत्यों से इनका हिटलरी तरीका साफ़ झलक रहा है। ये जनमानस का उनके प्रति दिखाए गए श्रद्धा के भाव को अपना अधिकार समझ बैठे हैं। और इस मद में इतने ज्यादा चूर हो गए हैं की इन्हें सही और गलत में अंतर नहीं समझ आ रहा है। ये संत शायद भूल गए हैं की जनता की भावनावो  से खेलने का अंजाम बहुत बुरा होता है। और जनता किसी को सर-आँखों पर बिठाना जानती है तो उसे धुल में मिलाना भी जानती हैं।
    मुझे ये नहीं समझ आता की आगे अब ये किस मुंह से से जनता को प्रेम और भाईचारे का उपदेश देंगे। क्या इन्हें तब शर्म नहीं आएगी जब ये अपने भक्तो को अपना गुस्सा काबू करने का और क्षमा करने का पाठ पढ़ाएंगे। और अब इनके भक्तो को भी एक बार ये सोचना चाहिए की जो इन्सान खुद को काबू में नहीं रख सकता वह दुसरे को क्या काबू में रहना सिखाएगा।
    अकूत सम्पति के मालिक आसाराम बापू आज हलिकोप्टर में यात्रा करते है पर अगर जनता ने एक बार ठान ली तो इन्हें धुल में मिलकर छोड़ेगी। इसलिए संभल जाईये, जनता अगर प्यार और इज्जत देना जनता है तो नफरत और सजा को भी नहीं भूली है।

Monday, 7 May 2012

सुनो सब की, करो अपने मन की


कई बार हम अपने जिंदगी में ऐसे मोड़ पर पहुँच जाते है जहाँ हम खुद को कोई फैसला लेने में असक्षम पाते हैं। जहाँ हमारे सामने कई विकल्प होते हैं, और हमें उनमे से कोई एक चुनना होता है। और हर एक विकल्प हमारे जिंदगी को एक नयी दिशा देता है पर हम सिर्फ एक के साथ जा सकते हैं। यहाँ हम खुद को गहरे अंतर्द्वंद में पाते हैं। एक तरफ हमारे दिल की कुछ और मांग होती है तो दूसरी तरफ दिमाग कुछ और सोचता है। हमें अपने ख़ुशी और अपने मज़बूरी में से किसी एक को चुनना होता है। चुनाव की यह दशा हमारे लिए बेहद कठिन हो जाती है क्योकि इस चुनाव से हमारा भविष्य जुड़ा होता है। और हम अपने भविष्य को जोखिम में नहीं डालना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में हमें जरुरत होती है अपने किसी ऐसे की जो हमें बेहतर सुझाव देकर हमारी मदद कर सके। ऐसे में हम अपने बड़ो से मिलते हैं जिन्होंने जिंदगी में कभी इस परिस्थिति का सामना किया होता है, और उनको इसका अनुभव होता है। हम उनसे आशा करते है की शायद उनका सुझाव हमारे किसी काम सके। पर कहते हैं , "जितनी मुंह उतनी बातें", ऐसा ही कुछ यहाँ भी होता है। हम जितने लोगो से मिलते हैं, हमें उतने ही प्रकार के अलग अलग सुझाव मिलते हैं। कोई किसी एक रास्ते को सही बोलता है तो दूसरा उसे गलत। बात अनुभवों की है, किसी को वो रास्ता अच्छा लगा, उसने उस रास्ते को चुनकर जिंदगी में तरक्की की, तो वह हमें भी वहीँ सुझाव देता है। तो दूसरा इंसान, जो उसे बुरा बोलता है, उसको इस रास्ते के साथ बुरे अनुभव हैं। और अंत में, हम खुद को वहीँ पाते हैं जहाँ हम शुरू में थे। उसी अंतर्द्वंद में फंसे हुए की क्या करे, किससे पूछे।
बीते दिनों मेरे साथ भी कुछ ऐसी ही समस्या गयी थी। जब मुझे अपने कैरियर से जुड़ा एक चुनाव करना था। मै खुद को अजीब स्थिति में पा रहा था। मै समझ नहीं पा रहा था की मै क्या करूँ। मै एक रास्ते को चुनना चाहता था, पर बार-बार ये सोच रहा था की कहीं ऐसा करके मै अपने भविष्य को जोखिम में तो नहीं डाल रहा हूँ। भविष्य का डर मुझे कोई निर्णय लेने के लिए मजबूर कर रहा था। मै असमंजस में पडा सोच रहा था की क्या करू। फिर सोचा, अपने सीनियर्स से पुछू, शायद उनको इस बात का अनुभव हो। पर कोई फायदा नहीं हुआ। किसी ने कुछ और सुझाव दिया और किसी ने कुछ और। सबने अपनी अपनी बाते बताई। पर मेरा दिमाग किसी भी बात से संतुष्ट नहीं हुआ। जब मै वापस लौटा तो फिर वहीँ सवाल, क्या करूँ....?????
अपने कमरे में काफी देर तक बैठे हुए मै खुद को एक निर्णय पर पहुचाने की कोशिश कर रहा था। पर बार-बार दिल और दिमाग में बहस छिड़ जा रही थी, दिल खुशियों को देख रहा था और दिमाग भविष्य को। रह-रह कर मन में सीनियर्स द्वारा कही हुई बाते भी रही थी। सोचता था, कहीं यह निर्णय लेकर मै खुद को संकट में तो डाल लूँगा। कहीं मेरा यह निर्णय मेरे करियर के लिए कोई समस्या तो बन जाए। इन सब बातो ने मुझे बड़ी अजीब स्थिति में डाल दिया था। आज मै कितना बेबस सा हो गया था। भविष्य के डर से मै अपने जीवन का एक निर्णय नहीं ले पा रहा था। आज मेरे पास इतनी भी हिम्मत न थी की मै अपने निर्णय को सही साबित कर सकू। और आज मुझे अपनी जिदगी के बारे में दुसरे से पूछना पर रहा था। मुझे खुद के इस कमजोरी पर गुस्सा आ रहा था। कमरे में बैठा हुआ यहीं सोच रहा था की मेरे एक दोस्त ने मुझे फ़ोन किया। फ़ोन पर भी मै उससे सही से बात नहीं कर पा रहा था, फिर उसने मेरे उलझन का कारण पुछा, और मैंने उसको सारी बात बता दी। सुनकर उसने हँसते हुए कहा की बस इतनी सी बात है और तुम इसके लिए इतना तनाव में हो। मुझे उसपर गुस्सा भी रहा था, मेरी इतनी बड़ी समस्या को वह इतना छोटा कैसे समझ कर मेरे ऊपर हंस रहा था उसने हँसते हुए  कहा की यह जिंदगी मेरी हैं, और चुनाव मुझे करना है तो फिर मै दुसरो से क्यों पूछ रहा हूँ। मुझे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने चाहिए और फिर खुद में इतना जज्बा होना चाहिए की उसको सही साबित कर सकू। जितना और हारना, ये तो जिंदगी के दो पहलू हैं, इनसे क्या घबराना।
और अंत में मैंने वही किया जो मै चाहता था। हाँ, इतना संकल्प जरुर था की अपने इस फैसले को सही साबित करने के लिए मै कुछ भी कर दूंगा। जिंदगी मेरी तो फिर फैसला मेरा। जीत गया तो मेरी जीत और हार गया तो कुछ सिखने को तो जरुर मिलेगा। वैसे भी, ये जिंदगी का एक और नया अनुभव था। 

Tuesday, 3 April 2012

कीमत

आज जब वो घर लौट रही थी तो काफी अँधेरा हो गया थावो ऑफिस में देर तक रुक गयी थी, काम कुछ ज्यादा थाऔर इसलिए वो थकी हुई थी और थोडा परेशान भीघर पहुचने पर उसने देखा की उसका आठ साल का बेटा दरवाजे पर खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा थाबच्चे के चेहरे पर उदासी झलक रही थीउसने अपने बच्चे को गोद में लेना चाहापर इससे पहले उसका बेटा बोल पड़ा
बेटा: "माँ, मुझे तुमसे एक बात पूछनी है।"
उसने जवाब दिया: "हाँ हाँ, पूछोक्या बात है?"
"माँ, तुम्हारे एक घंटे की वेतन कितनी हैं?" बच्चे के चेहरे पर मासूमियत थी
उसको गुस्सा गयाएक तो आज वो पहले से ही बहुत ज्यादा थकी हुई थी उसपर बच्चे के ये बेहूदा सवालकाम का सारा गुस्सा उसने अपने बच्चे पर उतर दियागुस्से में वो बोली "इससे तुम्हे क्या मतलबतुमने ऐसा सवाल पुछा भी कैसे।"
"मै बस जानना चाहता थामाँ, बताओ ना, तुम एक घंटे में कितना कमा लेती हो।" बच्चे के चेहरे पर अब भी मासूमियत थी
"पचास रुपये"
"माँ, क्या तुम मुझे पच्चीस रुपये दे सकती हो?" बच्चे ने डरते हुए पुछावो अब भी निचे देख रहा था
उसका गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गयावो आग-बबूला हो कर बोली, "अच्छा, तो तुम इसलिए मेरा वेतन पूछ रहे थेमै तुम्हे पच्चीस रुपये दूँ और कल तुम फिर एक बेकार खिलौना या कोई फालतू चीज खरीदोगेमेरे पास इन बेहूदा कामो के लिए पैसे नहीं हैंचलो, सीधे अपने कमरे में जाओ और जाकर पढाई करोमै इन व्यर्थ चीजो के लिए नौकरी नहीं करती।"
बच्चा चुपचाप अपने कमरे की तरफ चला गयाउसके चहरे पर अब भी उदासी थीउसने जाकर अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लियावो भी अपने कमरे में आकर सोफे पर बैठ गयीकमरे में बहुत ज्यादा गर्मी और उमस थीउसने पंखा चला दियापर कमरे में उसका मन बेचैन हो रहा थावो बाहर बालकनी में आकर बैठ गयीशाम के समय बाहर ठंडी हवा चल रही थीउसके मन को थोडा सुकून मिलावो आँखे मूंद कर कुछ सोचने लगीउसके दिमाग में दिन भर का काम चल रहा थातभी उसे ध्यान आया की आज उसके बेटे ने ऐसा क्यों कियाउसे पैसे की क्या जरुरत थीआज से पहले तो उसने ऐसा नहीं किया था तो फिर आज क्या बात थीहो सकता है उसे पैसे की जरुरत किसी अच्छे काम के लिए होहो सकता है उसे कुछ जरुरी सामान खरीदना होअब उसका मन शांत हो चूका था और थकान भी कम हो गयी थीसो उसे अपने किये पर अफ़सोस हो रहा थाउसने सोचा, चल कर पूछ ले, आखिर बात क्या है
वो अपने बेटे के कमरे की तरफ गयी, जाकर दरवाजा खोलाबच्चा किताब खोलकर ऊपर देख रहा था और कुछ सोच रहा थाउसने बड़े प्यार से पुछा, "तुम्हे भूख तो नहीं लग रही।"
"नहीं" बच्चे ने सपाट सा जवाब दिया
वो उसके पास जाकर बैठ गयी और बोली, "मै उस समय थकी हुई थी और परेशान भी, सो तुम्हे डांट दियाये लो तुम्हारे पच्चीस रुपये।" कहते हुए उसने बच्चे को पच्चीस रुपये दे दिए
बच्चा सीधा बैठ गयाफिर उसने तकिये के निचे से कुछ पैसे निकालेउसने देखा की बच्चे के पास पहले से ही कुछ पैसे हैं, यह देखकर उसे फिर से गुस्सा गयाबच्चे ने धीरे से पैसे गिने और फिर अपनी माँ की तरफ देखा
"तुम्हारे पास जब पहले से ही पैसे थे तो फिर तुमने मेरे से पैसे क्यों मांगे।" उसका चेहरा सख्त हो गया था
"क्योकि मेरे पास पूरे पैसे नहीं थे पर अब हैं।" बच्चे ने जवाब दिया
"माँ, मेरे पास अब पचास रुपये हैंक्या मै तुमसे तुम्हारे एक घंटे खरीद सकता हूँमाँ, कल तुम एक घंटा पहले आनामै शाम को बहुत अकेला रहता हूँमुझे शाम में तुम्हारी जरुरत पड़ती है।"
वो अवाक् रह गयी, उसने अपने बेटे को अपने बाहों में भर लिए और उससे माफ़ी मांगने लगीउसकी आँखों से आंसू गिर रहे थे

वो अब जान चुकी थी, आज उसकी जरुरत उसके कंपनी से ज्यादा उसके बेटे को हैकल को होकर अगर वो मर जाती है तो उसकी कंपनी उसकी जगह किसी और को रख लेगीपर उसका बेटा हमेशा के लिए अकेला रह जायेगा, क्योकि वह उसके जगह किसी दुसरे को अपना माँ नहीं कह सकताआज उसे अपनी कीमत का एहसास हो चूका था